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Friday, June 15, 2012

मेरे ख़्वाब

मेरे ख़्वाब मुझे इतना बता ...
क्यों है आजकल तेरा मन खोया खोया ? 
तेरे कूछ छन्द ही तो  मेरे पलकों के सिरहाने ,
कवारे सिलवटों के दर सजाते है। 

मुझसे ना तू अपनी मोतियों की नगरी छुपा ,
 देदे मुझको जरा एक आना दो आना ।

 मेरी जो रुबाईया है, वो भी तो अमानत हैं तेरी 
जरा सोच मेहर बनकर तू क्या पायेगी ।

मेरे नींद के कोरी कटोरियों में ,
  आज बरस जा तु निस्ब्द बनकर ।

 मेरे ख्वाब मुझेइतना बता ...

हैं अभी ख्वाबों के दीवारों दर कवारे ....
  ना   कर तू इस्तकबाल दरख्त ऐ आरजू का ,
 रहने दे मेरे ख्वाबों को थोरा और  बेताहसा ..

इन आँखों के रँगरेज से बच के कहा जायेगी ,
 बर्फीली घाटियों में भी ,मेरी  हथेलियों में तू सज जायेगी ।

आ अब वहां चले ...जहाँ हक़ीकत की  जमीं पे ......तू सरसों और मै कावेरी  बन जायुगी ....।।