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Wednesday, March 27, 2013

कैसों रंग


 अबकी ये कैसों रंग हैं सावरें ,
न तन भीगें न मन  भाये ,
  लागे जैसे कोई बैरन 
बिना संदेस के दरवाजा पे बाट जोहें !

 येहड़ देहड़ सब पिलों कर गयों  ,
वो रंग न लगीयों ,
जेहन नैयन शाम बसियों !

इत उत सब करूं ,
बिन चित के साज  रचाऊ ,
हिनक धिनक के काज कराऊँ ,
झूठों हिलोड़ मैं जताऊँ ,
छब में हैं तेरों  रंग सावरें ,
दूजों रंग मैं कैसे लगवाऊँ !

  होरी में मैं बनी बिहोरी 
लेकिन तेरी लियें हैं ,सब चितचोरी 
रस रंग में तू तो सोया ,
मैं तेरे चिन्तन में रही खोई !

इबरी होरी में सब  ऐसों नहावे ,
अंतरमन भी  रंग जावे !
वो परम सुख पावें जिन खातिर 
श्याम राधा संग रास राचावें ! 


अबकी ये कैसों रंग हैं सावरें ,
न तन भीगें न मन  भाये ,