Thursday, May 15, 2025

थोड़ा सा रूमानी हो जाएं?"

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थोड़ा सा रूमानी हो जाएं (जीवनहीन जीने के लिए)

उम्र सुनो जरा 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं।
जीवन हैं चार दिन , तो क्यों न 
जिए जीभर के।
हां जी, तो यह है प्रेम लीला—
दशक 80-90 का दौर, एक मध्यमवर्गीय दंपति की कहानी।

पहला दृश्य: श्रीधर और गृह मंत्रालय

श्रीधर बेचारे, प्रेम और सौहार्द के मारे,
विवाह उपरांत, गृह-न्यायालय में हाजिर हुए।
उम्र बसंती,
जिम्मेदारियों की तेल में
दीपक की बाती-सी जल गई।
जब उमड़ा प्रेम का ज्वार, तो बोले श्रीधर—
"अरे सुनती हो, थोड़ा सा रूमानी हो जाएं?"

गृह मंत्रालय से धीमा उत्तर आया—
"क्या जी, बयौरा गये हैं?
मुन्नू-चुन्नू बड़े हो रहे हैं,
और आपको रोमांस चढ़ा है!
धर्मेंद्र जी बने फिरते हो क्या?
चलो, हाट-बाजार चलते हैं,
आज इतवार है, कुछ सस्ती सब्जी ही ले आएं।"

श्रीधर बाबू का चेहरा बुझी लालटेन-सा धूमिल हुआ।
मन ही मन बोले—
"हाय मुहब्बत जिंदाबाद!
क्यों श्रीमती, प्रेम को यूं त्याग रही हो?
देखो तो, प्रेम लीला हमारे जीवन के चौराहे पर
कटोरा लिए खड़ी है।"

"इक आना, दो आना दे दो प्रिय,
सुनो न, रात को ही सही,
अरे भाग्यवान, ये जीवन हैं 
जियो आज और आज ही 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं?"


दूसरा दृश्य: दिनेश बाबू और उनकी प्रेम-सुहासिनी

यह हैं दिनेश बाबू—
ज्ञान के पुजारी, पेशे से डॉक्टर,
उपाधियों की लंबी हैं सूची l
पर उनकी श्रीमती— बड़ी लचीली,
रति-रंग प्रेम-सुहासिनी!
उम्र चालीस में भी छोकरों का दिल धड़काती।

सप्ताहांत की शाम थी,
दिनेश बाबू पढ़ाई में मगन थे।
पत्नी ने छेड़ा—
"प्रिय, आज कैंडल-लाइट डिनर करें?"

ज्ञान के क्रांतिकारी सिपाही मुस्कुराए—
"अरे, मोमबत्तियों में भोजन खाने का क्या तुक?
आओ, तुम्हें रोमांटिक गाना सुनाता हूँ!"

सुर साधे, स्वर छेड़ा—
"इक तेरा साथ हमको दो जहां से प्यारा है..."

पत्नी दस कदम दूर बैठी,
पलकों से भावनाएँ छलकीं,
मगर आधी रात होते ही बोली—
"वाह! बहुत अच्छा गाया,
पर अब नींद से भारी हो रही हैं पलकें।
चलो, सोने चलती हूँ।
तुम भी अपना करवा समेटो,
रात आधी हो चली है।"

फिर भी मन में हलचल थी,
तो बोली धीरे से—
"दिनेश, यार, कभी-कभी ही सही,
लेकिन जिए जरा दिल से 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं!"

उफ्फ... मुहब्बत जिंदाबाद!

पुराने दिनों का प्रेम

प्रेम के जमाने वो भी थे—
संयुक्त परिवार की दुनिया में,
माँ खुद बहाने से छत पर भेजती थी—
"जाओ, आज छत पर ही सो जाना,
घर में मेहमान आए हैं।"
हाय मुहब्बत ज़िंदाबाद l
और महानगरों में भी प्रेम अंकुरित था—
दिनभर की भागदौड़ के बाद,
रात ही थी, ताक-झाँक के लिए।
पर जैसे ही रात के बारह बजे,
नगर निगम का आतंक जागता—
"उठो, उठो! नल में पानी आ गया!"

हाय, मुहब्बत जिंदाबाद!
अब ऐसे में भी प्रेम जी रहा था।
पत्नी बाल्टी भरती, और मैं...
बस उसे निहारता ही रह जाता।

लेकिन फिर एक दिन,
धीरे से मुस्काई वो और बोली—
"सुनो, कल घर में कोई नहीं होगा,
तो थोड़ा सा रूमानी हो जाएं!"

आधुनिक प्रेम: उलझन और प्रश्न

छोड़ो इन अधूरी बातों को,
अब करते हैं आज की बात।
प्रेम तो आज भी भारी है,
पर मुश्किलें भी कुछ कम नहीं।

पहले फुर्सत नहीं थी, अब संस्कारों में झिझक है।
फिर भी प्रेम सौहार्द में ब्रेकअप-सॉन्ग नहीं बजा था,
ना ही "अपना वाला छोड़, कोई और भाया" था।
मगर आज...?
बीसवीं सदी का प्रेम इतना बेबस क्यों है?
यह मेरा-तेरा, काम में बदलता क्यों जा रहा है?
संस्कार अब कटाक्षों में सिमट रहे हैं,
पहले उसकी खुशी में दिल धड़कता था,
आज उसकी खुशी से शिकायत क्यों है?

प्रेम की परिभाषा

प्रेम अब इतना कंजूस क्यों है?
सुहागन दिखना पहले सौभाग्य था,
अब सिंदूर न लगाना फैशन हो गया है।
पर प्रेम केवल आकर्षण नहीं,
यह सौभाग्य और समर्पण का संगम है।

सच्ची लगन से प्रेम करो,
तो तुमसे बड़ा कोई अंबानी नहीं।
जो इंतजार और धैर्य से प्रेम तक पहुँचते हैं,
उन्हीं को अपनी प्रेमिका में
इंद्र की अप्सराएँ नजर आती हैं।

बाकी जीवन में,
मध्यमवर्गीय दंपति का प्रेम-सौहार्द रहेगा।
जीवन हैं आज कल नहीं होगा 
हर काम करो ,जीने के लिए 
चिंता त्याग कर ,जियो जीभर के 
पल में जैसे सदियों जी लिए 
कुछ हैं कुछ होगा 
जो न हुआ तो कुछ और होगा 
तो 
"थोड़ा सा रूमानी हो जाएं?"




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Friday, March 7, 2025

ग़ज़ल


जो दिल की जबान रेशमी अदा में शब्दों की डोली में आँखों से छलकती हैं उसे ग़ज़ल कहतें हैं :- 


मेरी तलाश हो तुम -2
तुझको मैंह्फुज रखेगें 
दिल की जन्नत में  
 मेरी तलाश हो तुम -2
गर हैं प्यार दुआँ ...
तो दुआँ  तुम  रहो 
गर हैं सज़ा भी इश्क 
तो सजा में मैं ही रहूँ ..
डालकर तुम पर   आलिशान सा मन 
 तुझको मैंह्फुज रखेगें 

दिल की जन्नत में  
 मेरी तलाश हो तुम -2

न कोई शक हैं ना शुबां ही सनम 
तेरी सासों के संग हैं 
 शबनमी   राबिता सा सनम 
सौपकर तुझको  सुगंध महल
 तुझको मैंह्फुज रखेगें 
दिल की जन्नत में  
 मेरी तलाश हो तुम -2

तेरी दिल की सिलवटों में 
ना होगी कोई अर्जी  मेरी 
रचना हु मैं तेरी 
 चाहें तू अब जैसे भी पढ़ 
तुझको मैंह्फुज रखेगें 
दिल की जन्नत में  
 मेरी तलाश हो तुम -2


चाहतों में कभी कोई इल्जाम न  देंगें   तुम्हें 
चाहो तो रख लो हर शय 
जो बारिश में बिखरें थें कभी 
मेरी पहचान हो तुम
तुझको मैंह्फुज रखेगें 
दिल की जन्नत में  
 मेरी तलाश हो तुम -2

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आँखों के कारोबार में दिल की हार जरुरी हैं
जो चुपके से रोक लें आंसू ..ऐसी आँखों का मुस्कुराना जरुरी है
जो सब कुछ समर्पित करें अपनों की ख़ुशी पे
ऐसे इक आपने का  जीवन में होना जरुरी है  
आँखों के कारोबार में दिल की हार जरुरी हैं

Thursday, March 6, 2025

"लोरी"

राजा बेटा  रानी  बेटी ,
परियों  की  रानी  आयेगी  सुन्दर कहानी  सुनायेगी!
          
राजा बेटा  रानी  बेटी ,


सागर के  जितने शंख सुहाने,
जुगनू वो तारें प्यारे सारे,
नई दुनिया कोई  बनायेगी 
            सुन्दर कहानी सुनायेगी......       
                     

राजा बेटा  रानी  बेटी ,


चाँद से लेके प्यार की डोरी ,
काजल भर के आखों में,  
सिरहाने तेरे बठेगी
सुन्दर कहानी सुनायेगी !
                    राजा बेटा  रानी  बेटी ,
अलसाई पलकों को सैह्लाकर, 
आँचल का झुला बनाकर ,
सपनों की मोंती पिरोयेगी
सुन्दर कहानी सुनायेगी 
 राजा बेटा  रानी  बेटी ,
परियों  की  रानी  आयेगी  सुन्दर कहानी  सुनायेगी!
 राजा बेटा  रानी  बेटी ,



This is only for women ,who really loves kids,and women has got inner connection and affection that arouse the feeling of love and care for children ,Lori is something which is liked by all the children,A mother gives birth to child and  a child gives birth to Lori,A mom automatically started murmuring something which become Lori for her child,Chanda hain tu mera suraj hain tu  is a famous Lori .Lori is a need of every society modern or conservative,rich or poor ,Lori always gives smiles and a nice sleep to children   


कैसों रंग


 अबकी ये कैसों रंग हैं सावरें ,
न तन भीगें न मन  भाये ,
  लागे जैसे कोई बैरन 
बिना संदेस के दरवाजा पे बाट जोहें !

 येहड़ देहड़ सब पिलों कर गयों  ,
वो रंग न लगीयों ,
जेहन नैयन शाम बसियों !

इत उत सब करूं ,
बिन चित के साज  रचाऊ ,
हिनक धिनक के काज कराऊँ ,
झूठों हिलोड़ मैं जताऊँ ,
छब में हैं तेरों  रंग सावरें ,
दूजों रंग मैं कैसे लगवाऊँ !

  होरी में मैं बनी बिहोरी 
लेकिन तेरी लियें हैं ,सब चितचोरी 
रस रंग में तू तो सोया ,
मैं तेरे चिन्तन में रही खोई !

इबरी होरी में सब  ऐसों नहावे ,
अंतरमन भी  रंग जावे !
वो परम सुख पावें जिन खातिर 
श्याम राधा संग रास राचावें ! 


अबकी ये कैसों रंग हैं सावरें ,
न तन भीगें न मन  भाये ,

इक खाब गाह

इक ख़्वाबगाह
 ऐसा भी हो 
जहां से दिखती  हो 
पीताम्बरी दुल्हन   सर्दियों वाली ,
नजर आयें वो दरगाह   भी   
जहां दर्ज होती हो फर्यादी अर्जियां दिल वाली ,
मन्शोख मेंहदी रंग लाती  हो  
 नसिबियत   तेरी हथेलियों पर भी !
इक ख्वाबगाह   ऐसा भी हो
 जहाँ से झाँकती  हो 
खुशियों की फुलवारी पुष्प वाटिका वाली  
इंतजार हो रिश्तों में शबरी  की नियत वाली 
ले ले कर थकें सब
 देने की लग जाएँ आदत निराली !
इक  ख़्वाबगाह ऐसा भी हो 
 जहाँ से मुश्कानी  खिरकी खुलती हो  ,
हर गली में बनकर बसंत वाली दामिनी
 हर खलश बन जाये ,कलश शांति का
 हो फिर हर जगह प्रेम दुलार वाली पालकी  !!
 इक  ख़्वाबगाह ऐसा भी हो 
जहां से दिखती  हो पीताम्बरी दुल्हन   सर्दियों वाली !!!! 




Sunday, March 2, 2025

कुछ ऐसा किया जायें

हमारे रिश्तों के आँगन  में जाने कितने रिश्तें आतें और जातें हैं ,मगर कुछ ही दिल के इतने करीब हो जातें हैं की उनकी खातिर हम कुछ भी कर गुजरतें  हैं। इन्ही रिश्तों की फुलवारी से कुछ छानकर कविता बनाने की कोशिश  है - शब्दों के दिल से ......   तो शब्दों की  नगरी, के बासिन्दों के हवाले करती हु ये कविता की कोशिश  ...   

क्यों न कुछ ऐसा किया जायें   ,

जिसे चाहें हम दिल से ,
उसे प्यार से भी बढकर प्यार किया जायें !

जो दिल की गहराईयों से हो कर रूह  तक शामिल हो ,
भूल कर भी  उसे -सवालों से न  तराशा  जायें ,
उसकी  सिरकत से ही   रग-रग में वाहिनी  हैं ,
 वो  हैं तो जिन्दगी का हर पल खुशमियाना  हैं ,
           अब ऐसे अजीज रिश्तों की जमीं पे
 दिल की मधुशाला बनाई जायें , 
     "क्यों न कुछ ऐसा किया जायें  "

न हो दामन में  शर्त की रंगत,
समर्पण रंगरेज से  रंगी हो चाहत की चुन्नी ,
 दो राह नही ये ,
पग -पग जुड़ के राह  बना,
 हैं ये   वो मंजिल,
   और
कच्ची नवेली कियारियों में ,
 लगन  बन जाता बरगद की छाँव हैं
                   ऐसे दिलें जुगुनू पे ,
    तमाम रौशिनी छानकर अम्बर से उतारी जायें ।।
         "क्यों न कुछ ऐसा किया जायें  "

 जज्बातों से सज जाती है जब  रति की  डोली ,
 शिथिल हो जाता  है तब  तांडव की भी बोली,
  हैं बड़ी अनोखी कारीगिरी ,
   बन जाती हैं गोपीयां भी मुह बोली सखी

          ऐसे छलियें पे ,
     मन की यमुना बहाई जायें 
       "क्यों न कुछ ऐसा किया जायें  "

प्यार वाले दिल में मथ -मथ  कर हैं भाव उभरता,
इक इक पल में सदियों का  हैं रैन बसेरा 
न खोने का अहसास न कुछ पाने की अभिलाषा ,
जाने कैसे- चाहतों की मिटटी ,
से सिर्फ अर्पण है उपजता !  
                 इस सिर्जन सी धरती को
        प्रेम मदिरा की नमी से सिंची  जायें  
             "क्यों न कुछ ऐसा किया जायें  "

सुनकर आवाज़ ही उसकी ,
ग़मों की आंधी ,सुकुनियत  की हवा है बन जाती ,
बस चाहना ही किसी को , खुद को करता हैं  हांफिज
          " फिर"
अपने आप में ही पूरी होकर जिवन बन जाता हैं ताबिज    ,
             ऐसे  इश्क़ पे
    दिल से अज़ान लगाई जायें 
               "क्यों न कुछ ऐसा किया जायें  "

शब्द तराईयों के परिंदें,
 अब और हिलोड  न मुझेसे करों ,,

प्रेम भाव की गजगामिनी को ,
आज बस यही विराम लगाई जायें ,
कवित्री का हैं अब अशर्वादी कथन ,
       प्यार ,प्रेम   संबंध से
               चमकता रहें हर दिल
 पुनम  चाँद की   हो जैसे   मंदिर
              तो ऐसे प्यार में  
  क्यों न पूरी जिंदगी इंतजार में बिताई जायें !!

            "क्यों न कुछ ऐसा किया जायें  "



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Wednesday, October 30, 2024

 रूप सरिता के हैं कई नछत्र ,जो  तरतें रहतें हैं प्रभात   स्नेह  सदन मन  में !
हर नछ्त्र में है शशि कीरणे   इन्द्रधनुषी  , एक रंग जूठे   बैर और दूजा राधा नयन में  स्याम  रंग ....

Sunday, September 29, 2024

मेरी ख्वाइशो की जंगल

मेरी ख्वाइशो की जंगल

       तूफान  आने से फह्लें 
           मुझको थोडा सा ठहर  जाने दो 
   उड़ भी जाये छत दिल के घरोंदें से ,
   कुछ तो  जीने के सामान सजों लेने दों 
            वो क्या खाक हैं हमारा ,
                जिसे बांध कर ,
       हर बार रिश्तें के  मिनार में रचा जाएँ ,
      मेरी ख्वाइशो की जंगल ,
      तूफान  आने से फह्लें 
      मुझको थोडा सा ठहर  जाने दो
यु तो लहरें सपनो की ,
सांत ही रोया करती हैं 
दोषारोपण वाली वाटिका में 
फिर अपनी ही चुनड से ,
पोछ कर बूंदें ,
लौट जाती हैं ,
उमिंद महल में ,
किरणों के कोलाहल से डर  कर 
मिलती हैं अक्सर खिलखिलाती हँसी ,
बुजुर्ग नीम की टहनियों में ,
बहार  सकूँ अपनी गली से ,
हरिली निमोलियों का पतझड़ 
इतनी तो मुझको संभल जाने दे !
 मेरी ख्वाइशो की जंगल ,
  तूफान  आने से फह्लें 
 मुझको थोडा सा ठहर  जाने दो!!



हर तरफ  मिलेगी छाव ,
 ये  पालना तो बस मिलती थी ,
बाबुल तेरे बचपन वाली आँगन में ,
अब तो कब आ जाएँ ,
पाँव  तलें भूखें नसीबों के परिन्दें 
बिना तार और संदेस के ,
इस लियें मुझको सहज जाने दे ,
ज्यादा तो नही ,
लेकिन थोड़ी सी बस ,
छुपा लेने दे ,
सुनहरी यादों की बगियाँ  

मेरी ख्वाइशो की जंगल ,
  तूफान  आने से फह्लें
मुझको थोडा सा ठहर  जाने दो!!





 

Saturday, April 28, 2018


 दिल से शायरी ताक   झाक करती हैं ,
 न खुद   सोती हैं न मुझको ही सोने देती  हैं
 गर भूले से झपक जायें  निन्दमारी रातें ,
तो  गालिबें अंदाज में जगाती  हैं ,
 पल में सरगम बनती और लम्हों  में करवट बदल लेती हैं

वो छुप छुप कर दिल टटोल रहा हैं ,
क्या हैं आस पास बस यही बटोर रहा हैं
जाने क्यूँ मुझको खुद के तराजू में तौल रहा हैं ,
मेरे  वजूद को जानकर भी वो  ,
यहाँ वहाँ   सज रहा  हैं
की सुरुवात शर्तों से ,
मेरे दिल की चाह का कारवाँ
अब डर कर ही सही
लेकिन     चाहती रंग में वो रंग रहा हैं
वैसे तो कब से अटकी थी मैं उसके दिल में ,
लेकिन वो जान  कर भी अनजान बन रहा था ,

 उमींद हैं  इस दिल को
की तू प्यार को प्यार ही रहने देगा
न खुद जिन्दगी में भाग कर
किनारा  पायेगा
और न मुझको भी   ...किनारे से मिलने देगा। ..
ये प्रेम दरिया हैं। ..डूब कर ही बैकुंठ मिलता हैं