Friday, June 15, 2012

मेरे ख़्वाब

मेरे ख़्वाब मुझे इतना बता ...
क्यों है आजकल तेरा मन खोया खोया ? 
तेरे कूछ छन्द ही तो  मेरे पलकों के सिरहाने ,
कवारे सिलवटों के दर सजाते है। 

मुझसे ना तू अपनी मोतियों की नगरी छुपा ,
 देदे मुझको जरा एक आना दो आना ।

 मेरी जो रुबाईया है, वो भी तो अमानत हैं तेरी 
जरा सोच मेहर बनकर तू क्या पायेगी ।

मेरे नींद के कोरी कटोरियों में ,
  आज बरस जा तु निस्ब्द बनकर ।

 मेरे ख्वाब मुझेइतना बता ...

हैं अभी ख्वाबों के दीवारों दर कवारे ....
  ना   कर तू इस्तकबाल दरख्त ऐ आरजू का ,
 रहने दे मेरे ख्वाबों को थोरा और  बेताहसा ..

इन आँखों के रँगरेज से बच के कहा जायेगी ,
 बर्फीली घाटियों में भी ,मेरी  हथेलियों में तू सज जायेगी ।

आ अब वहां चले ...जहाँ हक़ीकत की  जमीं पे ......तू सरसों और मै कावेरी  बन जायुगी ....।।

Friday, April 22, 2011

मन

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है: मन: "मन जो कहता है ,कास की हम वही कर पाते ? हम सोचते कुछ है और होता कुछ और है | फिर भी क्यों हम मन के बारिश में भींगे जाते है ? चल परते है उस ..."

मन

मन जो कहता है ,कास की हम वही कर पाते ?
हम सोचते कुछ है और होता कुछ और है |
फिर भी क्यों हम मन के बारिश में भींगे जाते है ?
चल परते है उस रह पर जिसकी मंजिल का पता ...................
खुद मन भी नही जानती ............
एक धुन है मन और हमारे सोच की बीच .............
जाने क्यों हम इस मन के सागर का किनारा चाह कर भी,
अपनी पतवार से नही मिलाते..............
शायद एक सोच है की मन जो कहता है , वही सच है "
और इसी सोच के साथ हम कर्वी निमोली को,
अपनी कोशिसो के मिसरी में खुला कर
कभी तिनके पर कभी बूंदों पर बरसाते रहते है ............
मन तो मन है,
चंचल बनकर हमे
एक ड़ाल से दूसरी ड़ाल तक
बसंत के झूलो सा झूलता रहता है |

Tuesday, March 15, 2011

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है -
हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं -
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
दूर  से झाँक रहे होंगे -
 चिड़ियों के बच्चों के चोंच में दाने भरता है ,
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल? -
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

स्याही रात की नींद से बातें करता है 
बिस्तर दादी के , पोती ठीक करती हैं 
मां चूल्हे को प्रणाम करती हैं 
 दिन जल्दी जल्दी ढलता है।
वंदना सिंह वासवानी 🙏🏻