मेरी ख्वाइशो की जंगल
Sunday, September 29, 2024
Saturday, April 28, 2018
दिल से शायरी ताक झाक करती हैं ,
न खुद सोती हैं न मुझको ही सोने देती हैं
गर भूले से झपक जायें निन्दमारी रातें ,
तो गालिबें अंदाज में जगाती हैं ,
पल में सरगम बनती और लम्हों में करवट बदल लेती हैं
वो छुप छुप कर दिल टटोल रहा हैं ,
क्या हैं आस पास बस यही बटोर रहा हैं
जाने क्यूँ मुझको खुद के तराजू में तौल रहा हैं ,
मेरे वजूद को जानकर भी वो ,
यहाँ वहाँ सज रहा हैं
की सुरुवात शर्तों से ,
मेरे दिल की चाह का कारवाँ
अब डर कर ही सही
लेकिन चाहती रंग में वो रंग रहा हैं
वैसे तो कब से अटकी थी मैं उसके दिल में ,
लेकिन वो जान कर भी अनजान बन रहा था ,
उमींद हैं इस दिल को
की तू प्यार को प्यार ही रहने देगा
न खुद जिन्दगी में भाग कर
किनारा पायेगा
और न मुझको भी ...किनारे से मिलने देगा। ..
ये प्रेम दरिया हैं। ..डूब कर ही बैकुंठ मिलता हैं
Sunday, July 21, 2013
ये कैसी हलचल हैं
क्यों बार बार मुझको ही,
रोकती हैं जिंदगी के फैसलें ,
ऐसे तो न थें,
नीम वाली छाँव तेरे इरादें ,
बचनपन से ही तूने तो ,
ताक झांक रखी ही ,
मेरे कच्ची निमोलियों पर ...
अब जरा
अपनी नजरों में पड़ी धुल
सावन के ओस से धो डाल ,
और इक राह पे ,
अपने पालकी को
कहारों के कन्धों से
बुड़े बरगद तक
तसल्ली से साँस लेने दे ।
ये मेरे हर तरफ ,
हलचल ही हलचल हैं ,
तू ही बता ?
क्या यें शराफत है !!
मेरे हर नन्ही सोंच
भी
तूने गागर से छलका दी ,
और हर बार ,
मुझको बनाकर बहाना
ईद के चाँद में सजा दी ।
मेरे अंदर कोई बंजड जमीं नही ;
इक दिल सा ही गाँव धड़कता हैं ,
मुस्कुराकर हैं नवाजां ,
हर तथ्य तेरे ताने बानो का ,
अब तो ये हलचल
थाम लें
और ख़त्म हो
मेरा भी सिलसिला ,
इक स्वप्न पर ,
कई स्वप्न पगडंडिओं सी
मुंडेर पे टांगने का .....
और बंद हो अब
मेरे कहकशां में
पाज़ेब तेरे हलचल का ।
Monday, February 18, 2013
लागी लगन
यु तो ज़माने के बदलतें शक्लों- सूरत ..लगन की भी पालकी का स्वरूप बदल ही चुके हैं ,लेकिन जो बदल न सका वो हैं इस लगन में रची विश्वास की मेंहदी ,इसकी मासूम सी पाक सी आँखें सदियों तक इक लगन की खातिर कई सदियाँ राह तकती हैं ....
लागी जब से लगन ,
मन बांवरा निश्चल ,
सजाता तकतें नैनो से
चुन चुन के फूल गुलमोहर के !
अब नही रहता कोई दुश्चल
दिल की अमराईयों में
हैं ठहराव कामनायों की
ऊँची हिमाय की सुर्ख़ियों में
लागी जब से लगन ,
बन गयी हूँ मैं
स्वप्न जड़ित बैरन पवन !
लागी जब से लगन
हर तरफ हु मैं मगन !
हैं बड़ी वेयगता
लगन वाली पायल को
सजें उमड़ घुमड़ कर
जिवन की फुलवाड़ी
मेरे भी पंचरंगी कूमकुम की चुनड़ से
बरसता रहें हर पल
तेरे मन में सुखद स्पंदन
लागी जब से लगन
हुई मैं बेकल ,अचेतन अचेतन !
था कभी मन में
बड़ा भैतल
रित वाली कजरी से ,
तेज दिया मन ने सारा वैधम्बर
ओढ़ा जब से
प्रेम रंग की राधिकी चादर
रहता हैं इक दम
दिल छितिज में
तू बनकर ईदी चंदन ,
लागी जब से लगन
बन गई मैं कोमल चितवन !
नैनो के बीच
जो काला तिल हैं
हैं वो मेरा स्नेह अंश ,
सजकर भी तू किसी और कमरबध ,
बजता रहेगा मेरे तन
हु मैं काया नन्द की ,
दुजें चिड मैं नजर न आऊं
तेजा तूने प्रीत भाव कलश
तब भी लगाई खुद को
नवरंग वाली प्रेम लगन
जताती रहूँगी मैं
तुझ पे अपनी प्रेम अगन
लागी जब से लगन
सजी मैं प्रेम दर्पण !
जंगल का भवन
कैलाशी रच न सका ,
कैसे सजेगा मेरा
स्वप्न भ्रमण ,
पथ दामनी मैं मोहने बाट की
चाहे तो रख हर्दय वन में ,
लागी जब से लगन
बरसाती मैं फागुनी रंगत !
रेत बनकर जिवन नाचें ,
मैं नाची तेरे रंग में ,
लोक लाज मुह ताकें ,
रोंके रति वेग येह्तर ओह्तर
मैं मीर रंग अपनी जपूँ
विह्मन तृप्ति पायें
जो तुझमें मैं भी छब जाउं
लागी जब से लगन
हो गई मैं तेरी अर्जन !
एकाकी मन का कौन केवट ,
मटकी में बहता तोयज ,
और कहाँ तक ,
बटोरें जिवन चम्पा,
तेरे सुख हूँ वचनवध
देती रहूँगी सुखधन ,
दृष्टि ज्योति से न दिखूँ ,
लेकिन रहूंगी मैं हरदम
तेरे आँगन की जोगन
लागी जब से लगन
बनी मैं नन्द
तेरे ऊर की चितवन !!
छोड़ा चित ने सारा वैभव
उमरती मैं सावन जैसा
चमकती हूँ मैं गंगन गंगन
लागी जब से लगन ''
साँस बनी राधा तो
रुकमिनी बनी मन सरगम !!
लगन की लगन से
कैसे दोशाला मैं छुपाऊ
जो इक बार लग जाएँ
सुनहरी हल्दी लगन की
सारी उम्र मिल के धोयें जग सारा
पिलों रंग लगन का धुल न पायें
लागी जब से लगन
जग बना देह्तल और मन बना मधुतल !!
लागी जब से लगन ''
लागी जब से लगन ''
लागी जब से लगन ,मन बांवरा निश्चल ,
सजाता तकतें नैनो से
चुन चुन के फूल गुलमोहर के !
अब नही रहता कोई दुश्चल
दिल की अमराईयों में
हैं ठहराव कामनायों की
ऊँची हिमाय की सुर्ख़ियों में
लागी जब से लगन ,
बन गयी हूँ मैं
स्वप्न जड़ित बैरन पवन !
लागी जब से लगन
हर तरफ हु मैं मगन !
हैं बड़ी वेयगता
लगन वाली पायल को
सजें उमड़ घुमड़ कर
जिवन की फुलवाड़ी
मेरे भी पंचरंगी कूमकुम की चुनड़ से
बरसता रहें हर पल
तेरे मन में सुखद स्पंदन
लागी जब से लगन
हुई मैं बेकल ,अचेतन अचेतन !
था कभी मन में
बड़ा भैतल
रित वाली कजरी से ,
तेज दिया मन ने सारा वैधम्बर
ओढ़ा जब से
प्रेम रंग की राधिकी चादर
रहता हैं इक दम
दिल छितिज में
तू बनकर ईदी चंदन ,
लागी जब से लगन
बन गई मैं कोमल चितवन !
नैनो के बीच
जो काला तिल हैं
हैं वो मेरा स्नेह अंश ,
सजकर भी तू किसी और कमरबध ,
बजता रहेगा मेरे तन
हु मैं काया नन्द की ,
दुजें चिड मैं नजर न आऊं
तेजा तूने प्रीत भाव कलश
तब भी लगाई खुद को
नवरंग वाली प्रेम लगन
जताती रहूँगी मैं
तुझ पे अपनी प्रेम अगन
लागी जब से लगन
सजी मैं प्रेम दर्पण !
जंगल का भवन
कैलाशी रच न सका ,
कैसे सजेगा मेरा
स्वप्न भ्रमण ,
पथ दामनी मैं मोहने बाट की
चाहे तो रख हर्दय वन में ,
लागी जब से लगन
बरसाती मैं फागुनी रंगत !
रेत बनकर जिवन नाचें ,
मैं नाची तेरे रंग में ,
लोक लाज मुह ताकें ,
रोंके रति वेग येह्तर ओह्तर
मैं मीर रंग अपनी जपूँ
विह्मन तृप्ति पायें
जो तुझमें मैं भी छब जाउं
लागी जब से लगन
हो गई मैं तेरी अर्जन !
एकाकी मन का कौन केवट ,
मटकी में बहता तोयज ,
और कहाँ तक ,
बटोरें जिवन चम्पा,
तेरे सुख हूँ वचनवध
देती रहूँगी सुखधन ,
दृष्टि ज्योति से न दिखूँ ,
लेकिन रहूंगी मैं हरदम
तेरे आँगन की जोगन
लागी जब से लगन
बनी मैं नन्द
तेरे ऊर की चितवन !!
छोड़ा चित ने सारा वैभव
उमरती मैं सावन जैसा
चमकती हूँ मैं गंगन गंगन
लागी जब से लगन ''
साँस बनी राधा तो
रुकमिनी बनी मन सरगम !!
लगन की लगन से
कैसे दोशाला मैं छुपाऊ
जो इक बार लग जाएँ
सुनहरी हल्दी लगन की
सारी उम्र मिल के धोयें जग सारा
पिलों रंग लगन का धुल न पायें
लागी जब से लगन
जग बना देह्तल और मन बना मधुतल !!
लागी जब से लगन ''
लागी जब से लगन ''
Friday, November 16, 2012
मुझको मुझी से मिलवा तुमने ,
ये कैसा जादू चलाया तुमने,
बिखरी हुई मेरी स्याहियों से ,
मेरी ही कहानी सुनाई तुमने ,
कोरें छत के कोनो में ,
रच -रच के अपनी छबी सजाई तुमने ,
मेरी पगडण्डी यों में राह बनाई तुमने ,
मुझको मुझी से मिलवा तुमने
ये कैसा जादू चलाया तुमने!!
इस कदर हैं वो शामिल मुझ में ,
हर पल में , हजार पल बनके याद आता हैं मुझको !
आँखों से ख्वाब तक सफ़र में तुम हो ,
जिस राह मोडू पलकें हर मोड़ पे तुम हों !
तेरे शहर से होकर जो आयें '
अब आपने ही घर पता पूछ्तें हैं हम सन्नाटों से !
ये जो सुरूर हैं तेरी आँखों का मेरी आँखों में ''
ये जो छाती हैं तेरी रंगत मेरी हसरतों में '
क्यों तुझको आपना बनाती हूँ ............
जबकि मालूम हैं मुझको हक़ीकत अधूरी कहानियों की ,
उसकी परेशानियों ने रोका उसे
इकरारें मुहब्बत से '
वरना चाहता तो वो भी होगा ....दिल गहराईयों से !!
रखों ध्यान की किसी का दिल न टूटें
और गर मिल ही जाएँ ..
अध्- ढकी रिश्तों की लाशें ....तो कफन तलक साथ निभायों दोश्तों !!!
आबाद होकर भी वो रहा बर्बाद सा , हम बर्बाद हो कर भी रहें आबाद तेरे इश्क में
* कब तक रहे कोई वक्त की आगोश में ,कभी तो वक़्त भी रहें मेरी आगोश में।
Sunday, September 30, 2012
इक सरहद होती
काश दिल की सरजमीं पे इक सरहद होती
तो हसरतें न भटकती अजनबी तेरे दिल के देश में
न दर्शत होतें तेरे मोहक भाव मेरे मन के सिलवटों में
काश की मैं रोक पाती हिलोड़ ,आशिकी तेरे छन्दों का
" तो "
एक भी शय मेरे गुलिशता से तुम तक न पहुचतें
न उड़ती मेरी ह्याँ की चुन्नी परदेशी तेरे छत के कोने में
काश दिल की सरजमीं पे इक सरहद होती
अब तो ये आपना रुख बदलेगी नही ,
थिरमिर होकर जल्जलें में मेरी कायनात बहा लेगी
अजनबी छावनी में आह तो भर लेतें हैं
राह में मंजिल तक त्वजुफ नही देतें
तो फिर क्यों न प्रेम नगर के परिंदों
दिल की सरजमी पे भी इक सरहद होती
इन अजनबियों को सुहानी तो लगती हैं
शर्मायाँ चाहत की अदायों का
पर इक पनघट से दूसरी पनघट
मिली है ये फिदरत इन्हें विरासत में
लेकिन जब विराज जातें हैं ये इक बार
दिल की धरती पर तो इन विरासतों से
करती है सरजमीं दिल की आलिंगन
अब दोस किस पे और कैसे लगाई जाएँ
इस कहकशाँ को अब यही,
दिल की जमीं पे दफनाई जायें !
और बन भी जायेगी गर सरहद दिल तेरी ज़मीन पर
फिर भी दिवालिया कर जायेगा ,
वो परदेशी दिल का वारिश बनकर !
गर देता है दिल को सुकून तो
निशा तुम ये कह लो
"बस इक ही सही "
लेकिन ऐ खुदां
दिल की सरजमीं पे इक सरहद होती
*********************************
तो हसरतें न भटकती अजनबी तेरे दिल के देश में
न दर्शत होतें तेरे मोहक भाव मेरे मन के सिलवटों में
काश की मैं रोक पाती हिलोड़ ,आशिकी तेरे छन्दों का
" तो "
एक भी शय मेरे गुलिशता से तुम तक न पहुचतें
न उड़ती मेरी ह्याँ की चुन्नी परदेशी तेरे छत के कोने में
काश दिल की सरजमीं पे इक सरहद होती
अब तो ये आपना रुख बदलेगी नही ,
थिरमिर होकर जल्जलें में मेरी कायनात बहा लेगी
अजनबी छावनी में आह तो भर लेतें हैं
राह में मंजिल तक त्वजुफ नही देतें
तो फिर क्यों न प्रेम नगर के परिंदों
दिल की सरजमी पे भी इक सरहद होती
इन अजनबियों को सुहानी तो लगती हैं
शर्मायाँ चाहत की अदायों का
पर इक पनघट से दूसरी पनघट
मिली है ये फिदरत इन्हें विरासत में
लेकिन जब विराज जातें हैं ये इक बार
दिल की धरती पर तो इन विरासतों से
करती है सरजमीं दिल की आलिंगन
अब दोस किस पे और कैसे लगाई जाएँ
इस कहकशाँ को अब यही,
दिल की जमीं पे दफनाई जायें !
और बन भी जायेगी गर सरहद दिल तेरी ज़मीन पर
फिर भी दिवालिया कर जायेगा ,
वो परदेशी दिल का वारिश बनकर !
गर देता है दिल को सुकून तो
निशा तुम ये कह लो
"बस इक ही सही "
लेकिन ऐ खुदां
दिल की सरजमीं पे इक सरहद होती
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Monday, September 24, 2012
तुम जो आये

जब प्रेम किसी भी मन को छू लेता हैं, तो ये सच है की रूह तक शुद्ध भाव उमरतें हैं और इन्सान को पूरी दुनिया उसकी प्रेम की कायनात लगने लगती हैं ।
प्रेम का स्वार्थ से कोई रिश्ता नही होता ये बस निश्छल धारा हैं जो हर भटके पथ को जीने की राह दिखाता हैं ।
कुछ ऐसे ही भावों की टोकरी है मेरी ये कविता ।
तुम जो आये हो जीवन में
हर बात में समान्तर है ,
तेरी आखों में मेरे सोच ,
सागर की करवटों में बलखाती हैं !
तुम जो आयें हो जीवन में , हर बात में समान्तर है !
हर पल उतरता है दिल में ,
बनकर महाकाव्य ,
छनिक ,छनिक में ,
बदलता है अब तों ,
भाव काव्येंतर मिर्दुल प्रीत का ,
तेरे लिये हूँ मै अब ,
पग छावनी पथ पथ ,
आ बांध दू तुझको ,
मैं मेरा सारा सुभवन,
तुम जो आये हो जीवन में, तो मन बना मधुवन हैं !
कणिक लता की अधखिली ,
पंखुडियां औंतार्मन करती अधर अधर ,
मेरा चित तो बन गया ,
तेरे वन का विराम अस्थल
तुम जो आयें हो जीवन में ,तो मैं गंगा, समंदर बन हिलरती हूँ !
जाओ तुम दुर या रहो पास ,
या कतराओ प्रीत गली से,
इन बातों से अब नही धुलेगा ,
स्याही प्रेमसमंध का ,
ना रखों याद्तन दूर से भी दूर तक मेरी अटखेली से ,
ना रोकुगी ,ना आवाज़ से पुकारुगी ,
ना मैं बजाकर पाजेबं रीझाउगी ,
अमर प्रेम की प्रिभाशिनी मैं
अखण्ड ज्योती बन रौशिनी
तेरी नगरी में अन्धकार पे बर्बस ही छा जाउगी ,
इतराता रह तू लेकर चंचल द्वार मन ,
मैं गंगा इक दिन सागर में कांतिमय हो जाउगी !!
************************************
Wednesday, September 19, 2012
वो जो आज ...
जाने क्यों कुछ मेरे अंदर से निचोड़ रहा है,
ये पल पल की आहटें मुझे झझोल रही हैं ,,
ये क्या है जो मेरी पूरी कायनात पर छा रहा ,
न शक्ल ही नज़र आती है ,न नक्स ही दिख रहा है
ये वादियों के संग कर रहा शिरकत कौन है
ये पहर बन क्यों मुझको अगोड़ रहा है ,
चाँद के संग निहारता और रौशिनी संग निखरता है ,
ये दस्तक किस नेकियाना बासिन्दें की है ,
रूप की डोली सजा लूँ, कुछ ऐसा ही अर्ज क्र रहा है ,
साँसों में भी शामिल होकर सरगम सुना रहा है ,
उठा दु पलकें तो ओझल और झुका लूँ तो दर्पण है ,
डरता है मेरी बेखुदी से शायद ....
या फिर अंधेरों की आदत थी .....मेरे उजालें से छिप गया
आस पास तो है भटकता .....लेकिन रूबरू से है डरता ...
क्यों की ..
जिन रिश्तों में पांकिज्गी होती है ,
उन रिश्तों की शक्ल - वो सूरत नही होती ..
नाम- और बेराद्री नही होती .......
ऐसे रिश्तें तो- न डगर देखतें हैं ,न रंग ऐ सूरत ..
बहती सरिता से यें ,
जिस भी राह से गुजरें बस नमीं से नवाज्तें हैं
अब कैसे भला कोई इन पांकिजे से रिश्तों का
जात ,नाम और धर्म तय करें
छोड़िये अहमकपना और पूछे हर कोई आपने दिल से ...
कैसे बांध पायेंगे सरिता की धार को ????
****************************************
Friday, June 15, 2012
मेरे ख़्वाब
मेरे ख़्वाब मुझे इतना बता ...
क्यों है आजकल तेरा मन खोया खोया ?
तेरे कूछ छन्द ही तो मेरे पलकों के सिरहाने ,
कवारे सिलवटों के दर सजाते है।
मुझसे ना तू अपनी मोतियों की नगरी छुपा ,
देदे मुझको जरा एक आना दो आना ।
मेरी जो रुबाईया है, वो भी तो अमानत हैं तेरी
जरा सोच मेहर बनकर तू क्या पायेगी ।
मेरे नींद के कोरी कटोरियों में ,
आज बरस जा तु निस्ब्द बनकर ।
मेरे ख्वाब मुझेइतना बता ...
हैं अभी ख्वाबों के दीवारों दर कवारे ....
ना कर तू इस्तकबाल दरख्त ऐ आरजू का ,
रहने दे मेरे ख्वाबों को थोरा और बेताहसा ..
इन आँखों के रँगरेज से बच के कहा जायेगी ,
बर्फीली घाटियों में भी ,मेरी हथेलियों में तू सज जायेगी ।
आ अब वहां चले ...जहाँ हक़ीकत की जमीं पे ......तू सरसों और मै कावेरी बन जायुगी ....।।
Friday, April 22, 2011
मन
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है: मन: "मन जो कहता है ,कास की हम वही कर पाते ? हम सोचते कुछ है और होता कुछ और है | फिर भी क्यों हम मन के बारिश में भींगे जाते है ? चल परते है उस ..."
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