Wednesday, July 30, 2014

ग़ज़ल -फिर वही बात दिल में , फिर वही शाम सिने में

                                       

फिर वही बात दिल में , फिर वही शाम सिने में  
ढल रहें हो तुम फिर आज बनके दिल में ज़ाम 
              फिर वही बात दिल में.…… 

जुस्तजू की दरम्यां में 

क्या कहें क्या छुपा हैं 

रा-जें जिंदगी हैं। … 
या तेरे होने का ऐतबार। । 
फिर वही बात दिल में , फिर वही शाम सिने में  


हरसू हैं तूँ  हर तरफ तूँ। .... 
हैं यें मेरी साँस। …… 
यां तेरे होने का  अहसास !!
फिर वही बात दिल में 


जाकती पलकों से 
बुन रहा हैं क्या मन 
हैं क़रीब ज़न्नत  
या सज रहा हैं फिर ख्वाब -गाह 
फिर वही बात दिल में


जीना हैं मुझको ज़ी भर के 
हाँ मगर शर्त ये 
ढलती रहें हर शाम
 संग तेरें रहनुमां 
फिर वही बात दिल में , फिर वही शाम सिने में  






Sunday, September 22, 2013

हो रही बंजड क्यों

 
हो रही बंजड क्यों 
 
ये मेरा अन्तः भावभर हैं 
 
या की दुविधा वाटिका की प्रवाह 
 
कोई वास्तविकता किरण भी हैं 
 
या हैं मन टाँगें का लचकता पहिया 
 
रोकती रहती हूँ जिसे मैं ,
 
वो बन  विचार वाहनी 
 
अकुला रही मुझे बार बार हैं 
 
मैं अवलोकन करती नैनों से
 
पूछती  हूँ नीलगगन से 
 
रिश्तों की धरती -हो रही बंजड क्यों ?
 
 
जो हैं सब  अपने 
 
तो रिश्तों का मन विरान  क्यों 
 
आह निकलने से पहलें ,
 
होता नही इलाज क्यों ?
 
जाने ये कौन सी पुरवा ब्यार  
 
उड़ाती ले जा रही हैं 
 
रंगोलीयों का कारवाँ 
 
कोई छावनी भी नही 
 
कलमुई इस ब्यार  का । 
 
जब रंगरेज़ के ही घर में 
 
रंगों का सुखाड़ हैं 
 
तो रुदन ही करती 
 
उड़ जाएगी रिश्तों की 
 
अध् पकी बाजड़े की गढ़रिया
 
इस मन से उस मन का हाल 
 
अब  कबूतर भी नही  बाँचते 
 
ऐसे में क्या  पुछू  
 
जो न पूछूँ तो निशा  बोझिल  हो जायें 
 
चल प्रारब्ध न सही 
 
छितिज से ही बतां --
 
रिश्तों की धरती -हो रही बंजड क्यों ?
   
 
  हर इक इन्सान बस भटका रहा हैं 
 
 खुशियों को खुशियों की राह से 
 
कभी बडपन दिखा कर 
 
तो कभी संस्कार  की बेड़ लगाकर 
 
जाने कब तक 
 
जलती रहेगी रिश्तों की होलिका 
 
मर्यादा ,रिवाज़ तेरी गोद में 
 
क्या बोलेगा इक दिन 
 
" फिर से कागा"
 
रिश्तों वाली छत की मुंडेर से 
 
जब  जब होगा   प्रहार 
 
रिश्तों के आँगन में 
 
गूंजती रहेगी पायल 
 
सरगम भरे सवाल से 
 
रिश्तों की धरती -हो रही बंजड क्यों
 
हो रही बंजड क्यों ??
 
   

 
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Sunday, July 21, 2013


ये कैसी हलचल हैं  

क्यों बार बार मुझको ही, 
रोकती  हैं जिंदगी के फैसलें ,
ऐसे तो न थें,
 नीम वाली  छाँव तेरे इरादें ,
बचनपन से ही तूने तो ,
ताक  झांक रखी ही ,
मेरे कच्ची  निमोलियों पर ...
अब जरा 
अपनी नजरों में पड़ी धुल  
सावन के ओस से धो डाल ,
और  इक राह पे ,
अपने पालकी को 
कहारों के कन्धों से  
  बुड़े बरगद तक 
 तसल्ली से साँस लेने दे ।    

ये मेरे हर तरफ ,
हलचल ही हलचल हैं ,
तू ही बता ?

क्या यें शराफत है  !!
मेरे हर नन्ही सोंच 
भी 
तूने गागर से  छलका दी ,
और हर बार ,
मुझको बनाकर बहाना
ईद के चाँद में सजा दी  ।  

 मेरे अंदर कोई  बंजड जमीं नही ;
इक दिल सा ही गाँव धड़कता हैं ,
मुस्कुराकर हैं नवाजां ,
हर तथ्य  तेरे ताने बानो का ,
अब तो ये हलचल 
थाम  लें  
और ख़त्म हो 
मेरा भी सिलसिला ,
इक स्वप्न पर ,
कई स्वप्न पगडंडिओं सी 
मुंडेर पे  टांगने का .....  
और बंद हो अब 
मेरे कहकशां में 
पाज़ेब तेरे हलचल का । 

Saturday, June 15, 2013

मेरी ख्वाइशो की जंगल

मेरी ख्वाइशो की जंगल

       तूफान  आने से फह्लें 
           मुझको थोडा सा ठहर  जाने दो 
   उड़ भी जाये छत दिल के घरोंदें से ,
   कुछ तो  जीने के सामान सजों लेने दों 
            वो क्या खाक हैं हमारा ,
                जिसे बांध कर ,
       हर बार रिश्तें के  मिनार में रचा जाएँ ,
      मेरी ख्वाइशो की जंगल ,
      तूफान  आने से फह्लें 
      मुझको थोडा सा ठहर  जाने दो
यु तो लहरें सपनो की ,
सांत ही रोया करती हैं 
दोषारोपण वाली वाटिका में 
फिर अपनी ही चुनड से ,
पोछ कर बूंदें ,
लौट जाती हैं ,
उमिंद महल में ,
किरणों के कोलाहल से डर  कर 
मिलती हैं अक्सर खिलखिलाती हँसी ,
बुजुर्ग नीम की टहनियों में ,
बहार  सकूँ अपनी गली से ,
हरिली निमोलियों का पतझड़ 
इतनी तो मुझको संभल जाने दे !
 मेरी ख्वाइशो की जंगल ,
  तूफान  आने से फह्लें 
 मुझको थोडा सा ठहर  जाने दो!!



हर तरफ  मिलेगी छाव ,
 ये  पालना तो बस मिलती थी ,
बाबुल तेरे बचपन वाली आँगन में ,
अब तो कब आ जाएँ ,
पाँव  तलें भूखें नसीबों के परिन्दें 
बिना तार और संदेस के ,
इस लियें मुझको सहज जाने दे ,
ज्यादा तो नही ,
लेकिन थोड़ी सी बस ,
छुपा लेने दे ,
सुनहरी यादों की बगियाँ  

मेरी ख्वाइशो की जंगल ,
  तूफान  आने से फह्लें
मुझको थोडा सा ठहर  जाने दो!!





 

Wednesday, March 27, 2013

कैसों रंग


 अबकी ये कैसों रंग हैं सावरें ,
न तन भीगें न मन  भाये ,
  लागे जैसे कोई बैरन 
बिना संदेस के दरवाजा पे बाट जोहें !

 येहड़ देहड़ सब पिलों कर गयों  ,
वो रंग न लगीयों ,
जेहन नैयन शाम बसियों !

इत उत सब करूं ,
बिन चित के साज  रचाऊ ,
हिनक धिनक के काज कराऊँ ,
झूठों हिलोड़ मैं जताऊँ ,
छब में हैं तेरों  रंग सावरें ,
दूजों रंग मैं कैसे लगवाऊँ !

  होरी में मैं बनी बिहोरी 
लेकिन तेरी लियें हैं ,सब चितचोरी 
रस रंग में तू तो सोया ,
मैं तेरे चिन्तन में रही खोई !

इबरी होरी में सब  ऐसों नहावे ,
अंतरमन भी  रंग जावे !
वो परम सुख पावें जिन खातिर 
श्याम राधा संग रास राचावें ! 


अबकी ये कैसों रंग हैं सावरें ,
न तन भीगें न मन  भाये ,

Monday, February 18, 2013

लागी लगन

यु तो ज़माने के बदलतें  शक्लों- सूरत ..लगन की भी पालकी का स्वरूप बदल ही चुके हैं ,लेकिन जो बदल न सका वो हैं इस लगन में रची विश्वास की  मेंहदी ,इसकी मासूम सी पाक सी आँखें  सदियों तक इक  लगन की खातिर कई सदियाँ राह तकती हैं .... 

 लागी  जब से लगन ,
मन बांवरा निश्चल ,
सजाता तकतें  नैनो से 
चुन चुन के फूल गुलमोहर के !
अब नही रहता कोई दुश्चल 
दिल की अमराईयों में 
 हैं ठहराव  कामनायों की 
ऊँची हिमाय की सुर्ख़ियों में 
 लागी जब से लगन ,
बन गयी हूँ मैं 
स्वप्न जड़ित बैरन पवन !
लागी जब से लगन 
हर तरफ हु मैं मगन !

हैं बड़ी वेयगता 
लगन  वाली  पायल को 
सजें  उमड़ घुमड़ कर 
जिवन की  फुलवाड़ी 
मेरे भी पंचरंगी कूमकुम की चुनड़ से 
बरसता रहें हर पल 
तेरे मन में सुखद  स्पंदन 
 लागी  जब से  लगन 
हुई  मैं बेकल ,अचेतन अचेतन !

था कभी मन में 
बड़ा भैतल  
 रित वाली कजरी से  ,
तेज दिया मन ने सारा वैधम्बर  
ओढ़ा जब से 
 प्रेम रंग की राधिकी चादर 
रहता हैं इक दम 
दिल छितिज में 
तू बनकर  ईदी चंदन ,
 लागी  जब से लगन 
बन गई मैं कोमल चितवन !

नैनो के बीच 
जो काला  तिल हैं
हैं वो मेरा स्नेह अंश ,
सजकर भी तू किसी और कमरबध  ,
बजता रहेगा मेरे तन 
हु मैं   काया नन्द की ,
दुजें चिड मैं नजर न आऊं 
तेजा  तूने प्रीत भाव  कलश 
तब भी  लगाई खुद  को  
नवरंग वाली प्रेम लगन 
जताती   रहूँगी मैं 
तुझ पे अपनी प्रेम अगन 
लागी जब से  लगन 
सजी  मैं प्रेम   दर्पण !

जंगल का भवन 
 कैलाशी रच न सका ,
कैसे सजेगा मेरा 
स्वप्न   भ्रमण ,
पथ दामनी  मैं मोहने बाट की 
चाहे तो रख हर्दय वन में ,
लागी  जब से लगन 
 बरसाती मैं फागुनी रंगत !
   
रेत बनकर जिवन नाचें ,
मैं नाची तेरे रंग में ,
 लोक लाज  मुह ताकें ,
रोंके रति वेग येह्तर ओह्तर  
मैं मीर रंग अपनी जपूँ  
विह्मन तृप्ति पायें 
जो तुझमें मैं भी छब जाउं 
लागी  जब से लगन 
हो गई मैं तेरी अर्जन !

एकाकी मन का कौन केवट ,
मटकी में बहता तोयज ,
और कहाँ तक  ,
बटोरें  जिवन चम्पा,
 तेरे सुख  हूँ   वचनवध  
देती रहूँगी सुखधन ,
दृष्टि ज्योति से न दिखूँ ,
लेकिन रहूंगी मैं हरदम 
 तेरे आँगन की जोगन 
लागी  जब से लगन 
बनी  मैं नन्द 
तेरे ऊर  की  चितवन !!

छोड़ा  चित ने  सारा वैभव   
उमरती मैं  सावन जैसा  
चमकती हूँ मैं  गंगन गंगन
लागी  जब से लगन ''
साँस बनी राधा तो
 रुकमिनी बनी  मन सरगम !!  

लगन की लगन से 
कैसे दोशाला मैं  छुपाऊ 
जो इक बार लग जाएँ 
सुनहरी हल्दी लगन की 
सारी  उम्र मिल के धोयें जग सारा 
 पिलों रंग लगन का  धुल न पायें 
लागी  जब से लगन 
 जग बना देह्तल और मन बना मधुतल !!
लागी  जब से लगन ''
लागी  जब से लगन ''



Friday, February 15, 2013

इक खाब गाह


इक खाब गाह
 ऐसा भी हो 
जहां से दिखती  हो 
पीताम्बरी दुल्हन   सर्दियों वाली ,
नजर आयें वो दरगाह   भी   
जहां दर्ज होती हो फर्यादी अर्जियां दिल वाली ,
मन्शोख मेंहदी रंग लाती  हो  
 नसिबियत   तेरी हथेलियों पर भी !
इक खाब गाह ऐसा भी हो
 जहाँ से झाँकती  हो 
खुशियों की फुलवारी पुष्प वाटिका वाली  
इंतजार हो रिश्तों में शबरी  की नियत वाली 
ले ले कर थकें सब
 देने की लग जाएँ आदत निराली !
इक खाब गाह ऐसा भी हो
 जहाँ से मुश्कानी  खिरकी खुलती हो  ,
हर गली में बनकर बसंत वाली दामिनी
 हर खलश बन जाये ,कलश शांति का
 हो फिर हर जगह प्रेम दुलार वाली पालकी  !!
 इक खाब गाह ऐसा भी हो 
जहां से दिखती  हो पीताम्बरी दुल्हन   सर्दियों वाली !!!!