Monday, February 18, 2013

लागी लगन

यु तो ज़माने के बदलतें  शक्लों- सूरत ..लगन की भी पालकी का स्वरूप बदल ही चुके हैं ,लेकिन जो बदल न सका वो हैं इस लगन में रची विश्वास की  मेंहदी ,इसकी मासूम सी पाक सी आँखें  सदियों तक इक  लगन की खातिर कई सदियाँ राह तकती हैं .... 

 लागी  जब से लगन ,
मन बांवरा निश्चल ,
सजाता तकतें  नैनो से 
चुन चुन के फूल गुलमोहर के !
अब नही रहता कोई दुश्चल 
दिल की अमराईयों में 
 हैं ठहराव  कामनायों की 
ऊँची हिमाय की सुर्ख़ियों में 
 लागी जब से लगन ,
बन गयी हूँ मैं 
स्वप्न जड़ित बैरन पवन !
लागी जब से लगन 
हर तरफ हु मैं मगन !

हैं बड़ी वेयगता 
लगन  वाली  पायल को 
सजें  उमड़ घुमड़ कर 
जिवन की  फुलवाड़ी 
मेरे भी पंचरंगी कूमकुम की चुनड़ से 
बरसता रहें हर पल 
तेरे मन में सुखद  स्पंदन 
 लागी  जब से  लगन 
हुई  मैं बेकल ,अचेतन अचेतन !

था कभी मन में 
बड़ा भैतल  
 रित वाली कजरी से  ,
तेज दिया मन ने सारा वैधम्बर  
ओढ़ा जब से 
 प्रेम रंग की राधिकी चादर 
रहता हैं इक दम 
दिल छितिज में 
तू बनकर  ईदी चंदन ,
 लागी  जब से लगन 
बन गई मैं कोमल चितवन !

नैनो के बीच 
जो काला  तिल हैं
हैं वो मेरा स्नेह अंश ,
सजकर भी तू किसी और कमरबध  ,
बजता रहेगा मेरे तन 
हु मैं   काया नन्द की ,
दुजें चिड मैं नजर न आऊं 
तेजा  तूने प्रीत भाव  कलश 
तब भी  लगाई खुद  को  
नवरंग वाली प्रेम लगन 
जताती   रहूँगी मैं 
तुझ पे अपनी प्रेम अगन 
लागी जब से  लगन 
सजी  मैं प्रेम   दर्पण !

जंगल का भवन 
 कैलाशी रच न सका ,
कैसे सजेगा मेरा 
स्वप्न   भ्रमण ,
पथ दामनी  मैं मोहने बाट की 
चाहे तो रख हर्दय वन में ,
लागी  जब से लगन 
 बरसाती मैं फागुनी रंगत !
   
रेत बनकर जिवन नाचें ,
मैं नाची तेरे रंग में ,
 लोक लाज  मुह ताकें ,
रोंके रति वेग येह्तर ओह्तर  
मैं मीर रंग अपनी जपूँ  
विह्मन तृप्ति पायें 
जो तुझमें मैं भी छब जाउं 
लागी  जब से लगन 
हो गई मैं तेरी अर्जन !

एकाकी मन का कौन केवट ,
मटकी में बहता तोयज ,
और कहाँ तक  ,
बटोरें  जिवन चम्पा,
 तेरे सुख  हूँ   वचनवध  
देती रहूँगी सुखधन ,
दृष्टि ज्योति से न दिखूँ ,
लेकिन रहूंगी मैं हरदम 
 तेरे आँगन की जोगन 
लागी  जब से लगन 
बनी  मैं नन्द 
तेरे ऊर  की  चितवन !!

छोड़ा  चित ने  सारा वैभव   
उमरती मैं  सावन जैसा  
चमकती हूँ मैं  गंगन गंगन
लागी  जब से लगन ''
साँस बनी राधा तो
 रुकमिनी बनी  मन सरगम !!  

लगन की लगन से 
कैसे दोशाला मैं  छुपाऊ 
जो इक बार लग जाएँ 
सुनहरी हल्दी लगन की 
सारी  उम्र मिल के धोयें जग सारा 
 पिलों रंग लगन का  धुल न पायें 
लागी  जब से लगन 
 जग बना देह्तल और मन बना मधुतल !!
लागी  जब से लगन ''
लागी  जब से लगन ''



Friday, February 15, 2013

इक खाब गाह


इक खाब गाह
 ऐसा भी हो 
जहां से दिखती  हो 
पीताम्बरी दुल्हन   सर्दियों वाली ,
नजर आयें वो दरगाह   भी   
जहां दर्ज होती हो फर्यादी अर्जियां दिल वाली ,
मन्शोख मेंहदी रंग लाती  हो  
 नसिबियत   तेरी हथेलियों पर भी !
इक खाब गाह ऐसा भी हो
 जहाँ से झाँकती  हो 
खुशियों की फुलवारी पुष्प वाटिका वाली  
इंतजार हो रिश्तों में शबरी  की नियत वाली 
ले ले कर थकें सब
 देने की लग जाएँ आदत निराली !
इक खाब गाह ऐसा भी हो
 जहाँ से मुश्कानी  खिरकी खुलती हो  ,
हर गली में बनकर बसंत वाली दामिनी
 हर खलश बन जाये ,कलश शांति का
 हो फिर हर जगह प्रेम दुलार वाली पालकी  !!
 इक खाब गाह ऐसा भी हो 
जहां से दिखती  हो पीताम्बरी दुल्हन   सर्दियों वाली !!!! 

इक धुंध सी हैं जिंदगी



इक धुंध सी हैं जिंदगी
थोड़ी खामोश थोड़ी गूम   हैं जिंदगी

थोड़ी  धुप भर तलाश हैं जिंदगी
छाँव  की छाँव  से डरती हैं जिंदगी

अब तो मेरे नाम से भी अजनबी हैं जिंदगी
गर साँस लेने को कहतें जिंदगी
तो नींद की तलाश में जाग  रही हैं जिंदगी

मेरी तो हर पहर में चौराहें  की बीच हैं  जिंदगी
   हिसाब में बड़ी पक्की हैं जिंदगी
सुबह हसाया तो  रात भर रुलाती हैं जिंदगी

शक्ल हैं ऐसी   बनाई
जैसे खानदानी कोई दुश्मनी हैं जिंदगी
देने की तो इक्गज्जि भी नियत नही हैं
बस मुझसे छिनकर जीती आयी    हैं जिंदगी

बैरन हैं ऐसी सौतन बनी की
मेरी गलियों में भी
 पत्थरों का ही मन हैं फेंकती

साँसों की सुनी छत और
 आखों में सपनो का   इंतजार लियें
देखें कब तक युही भटकती हैं जिंदगी
इक धुंध सी हैं जिंदगी
थोड़ी खामोश थोड़ी गूम   हैं जिंदगी